देवभूमि उत्तराखंड में होती है भगवान शिव के इन रूपों की पूजा, जानिए उन जगहों के बारे में

by Content Editor

देशभर में उत्तराखंड (uttarakhand) को देवभूमि के ​नाम से जाना जाता है। इसका अंदाजा यहां आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या से लगाया जा सकता है। यह किसी से छिपा नहीं है कि देवभूमि उत्तराखंड के कण-कण में भगवान शिव निवास करते हैं। श्रावण का महीना शुरू होते ही भगवान शिव (shiv temples) का जलाभिषेक शुरू हो जाता है। इस अवसर पर हिमालय के अंचल में स्थित पंचकेदार ( panchkedar) धामों में श्रद्धालुओं की भीड़ लगनी शुरू हो जाती है। आज हम आपको उत्तराखंड स्थित भगवान शिव के पंचकेदार धामों के बारे में बताने जा रहे हैं, जहां भगवान शिव के अलग अलग रूपों की पूजा की जाती है।

केदारनाथ धाम

उत्तराखंड स्थित चारधामों में से एक केदारनाथ धाम है। यह मंदिर 3593 फीट की ऊंचाई पर बना हुआ है। केदारनाथ को द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से एक माना जाता है। इसकी स्थापना आदिगुरु शंकराचार्य ने की थी। केदारनाथ धाम में भगवान शिव बैल की पीठ की आकृति-पिंड के रूप में पूजे जाते हैं। मान्यता है कि जब भगवान शंकर बैल के रूप में अंतर्धान हुए, तो उनके धड़ से ऊपर का हिस्सा काठमांडू में प्रकट हुआ, जहां भगवान भोलेनाथ पशुपतिनाथ के रूप में विराजमान हैं।

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Source – Hindustan Times

रुद्रनाथ में मुख की पूजा

चमोली स्थित रुद्रनाथ धाम समुद्रतल से 2290 मीटर की ऊंचाई पर है। महिष रूपधारी भगवान शिव का मुख इस मंदिर में, नाभि मदमहेश्वर में, भुजाएं तुंगनाथ में और जटाएं कल्पेश्वर में प्रकट हुईं। इसलिए इन चार स्थानों सहित श्री केदारनाथ को पंचकेदार कहा जाता है। पंचकेदार की स्थापना का संबंध महाभारत काल और पांडवों से जुड़ा माना जाता है। कहते हैं कि महाभारत के युद्ध में विजयी होने के बाद पांडव अपने सगे-संबंधियों की हत्या के पाप से मुक्ति पाना चाहते थे।

मदमहेश्वर में नाभि, तुंगनाथ में भुजा

मद्महेश्वर, मध्यमहेश्वर या मदमहेश्वर उत्तराखंड के गढ़वाल मंडल के रुद्रप्रयाग जिले में है। यहां भगवान शिव के महिष (बैल) रूप के मध्यभाग (नाभि) की पूजा की जाती है, इसीलिए इसे मदमहेश्वर कहा गया है। मान्यता है कि पांडवों के अपने ही भाइयों की गोत्र हत्या किये जाने से शिव नाराज थे। वे पांडवों से बचने के लिए हिमालय चले आए। बैल रूप धारण किए हिमालय में विचरते शिव को जब भीम ने पहचान लिया और उनका रास्ता रोकने की कोशिश की, तो गुप्तकाशी में शिव जमीन के भीतर घुस गए। जब वे बाहर निकले तो उनके महिष रूपी शरीर के विभिन्न हिस्से अलग-अलग जगहों पर प्रकट हुए।

कल्पेश्वर में जटाओं की पूजा

समुद्र तल से लगभग 2134 मीटर की ऊंचाई पर कल्पेश्वर धाम है। इस मंदिर में ‘जटा’ या हिंदू धर्म में मान्य त्रिदेवों में से एक भगवान शिव के उलझे हुए बालों की पूजा की जाती है। कल्पेश्वर मंदिर ‘पंचकेदार’ तीर्थ यात्रा में पांचवे स्थान पर आता है। कल्पेश्वर सनातन हिंदू संस्कृति के शाश्वत संदेश के प्रतीक रूप मे स्थित है। एक कथा के अनुसार, एक लोकप्रिय ऋषि अरघ्या मंदिर में कल्प वृक्ष के नीचे ध्यान करते थे।

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Web Title panchkedar shiv temples in uttarakhand

(Religious Places from The Himalayan Diary)

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