प्रकृति के सौंदर्य के बीच किश्तवाड़ में स्थित है मां दुर्गा का चमत्कारिक मंदिर

by Ravinder Singh

मचैल माता (machail temple) का मंदिर जम्मू कश्मीर (kashmir) में सबसे ऐतिहासिक धार्मिक स्थलों में से एक है। माता दुर्गा को समर्पित यह धार्मिक स्थल किश्तवाड़ (kishtwar) के मचैल गांव में मौजूद है। मचैल माता मंदिर की प्रसिद्धी पूरे देश में है। यहां देश के कोने-कोने से श्रद्धालु माता के दर्शन करने के लिए आते हैं। मान्यता है कि प्राचीन समय में योद्धा, युद्ध में जाने से पहले यहां पहुंचकर माता की पूजा अर्चना करते थे। मंदिर मचैल गांव के बीचों-बीच बना हुआ है। मचैल पहाड़ियों की गोद में बसा एक खूबसूरत गांव है। ऐसे में यहां प्रकृति के सौंदर्य के अद्भुत दर्शन भी होते हैं। आसपास मौजूद दुर्गम पहाड़ियों का नजारा देखने लायक होता है।

पिंडी रूप में विराजमान है माता

मचैल माता का मंदिर लकड़ी का बना हुआ है। मंदिर के बाहरी हिस्से में पौराणिक देवी देवताओं की लकड़ी की कई पटिकाएं बनी हुई हैं। मंदिर के अंदर गर्भग्रह में मां चंडी एक पिंडी के रूप में विराजमान हैं। पिंडी के अलावा गर्भग्रह में माता की दो मूर्तियां भी हैं। दो मूर्तियों में से एक मूर्ती चांदी की है। कहा जाता है कि यहां स्थित मूर्ती को लद्दाख के बौद्ध मतावलंबी भोंटों ने मंदिर में चढ़ाया था। यहीं कारण है कि इन मूर्तियों को भोट मूर्ति भी कहते हैं। मूर्तियों को कई प्रक्रार के आभूषण भी पहनाए गए हैं। मंदिर के सामने खुला मैदान है, जहां श्रद्धालु खड़े हो सकते हैं। सेना नायकों और योद्धाओं की इष्ट देवी होने के कारण मचैल माता को रणचंडी नाम से भी जाना जाता है।

machail temple kishtwar kashmir

1981 में शुरू हुई मचैल यात्रा

मान्यता है कि प्राचीन समय में जब भी किसी शासक ने लद्दाख या अन्य क्षेत्र में चढ़ाई की तो उसने इस मार्ग से गुजरते हुए मचैल माता मंदिर में आकर आशीर्वाद जरूर लिया था। साल 1947 में जब लद्दाख क्षेत्र पर पाकिस्तान ने कब्जा कर लिया था, तो भारतीय सेना के कर्नल हुकम सिंह ने यहां पहुंचकर माता से जीत की मन्नत मांगी। जब कर्नल हुकम सिंह जीत कर आए, तो उन्होंने मंदिर में भव्य यज्ञ का आयोजन किया और यहां माता की एक मूर्ती की स्थापना की। बाद में जब ठाकुर कुलवीर सिंह इस क्षेत्र में आए, तो वह माता की भव्यता से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने साल 1981 में मचैल यात्रा काे प्रारंभ किया। पहले यह यात्रा छोटे से समूह तक ही सीमित थी। लेकिन आज हर साल हजारों की संख्या में श्रद्धालु मचैल यात्रा के लिए पहुंचते हैं।

कैसे पहुंचें मचैल माता के मंदिर

इस धार्मिक स्थल तक पहुंचने के लिए सबसे पहले गुलाबगढ़ आना होता है। गुलाबगढ़ से मचैल माता मंदिर की दूरी लगभग 32 किलोमीटर है, जिसे पैदल ही तय करना पड़ता है। आमतौर पर लोगों को पैदल मंदिर तक पहुंचने में 2 दिन लगते हैं। रास्ते में कई गांव हैं, जहां रात में रुका जा सकता है। गुलाबगढ़ किश्तवाड़ से 66 किलोमीटर और जम्मू से 280 किलोमीटर दूर है। किश्तवाड़ और जम्मू से सड़क मार्ग द्वारा गुलाबगढ़ तक पहुंचा जा सकता है। गुलाबगढ़ से नजदीकी हवाई अड्डा और रेलवे स्टेशन जम्मू में है।

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