रुद्रप्रयाग में है सिद्ध पीठ श्री कालीमठ मंदिर, यहां आज भी महसूस होता है मां काली के होने का एहसास

by Ravinder Singh

देवभूमि उत्तराखंड (Uttarakhand) का रुद्रप्रयाग (rudraprayag) जिला कई ऐतिहासिक धार्मिक स्थलों के लिए जाना जाता है। उन्हीं धार्मिक स्थलों में से एक प्रसिद्ध शक्ति सिद्ध पीठ श्री कालीमठ मंदिर (kalimath temple) है। देवी काली को समर्पित यह प्रमुख धार्मिक स्थल समुद्र तल से 1463 मीटर की ऊंचाई पर है। श्री कालीमठ मंदिर को भारत के प्रमुख सिद्ध शक्तिपीठों में से एक माना जाता है। कहा जाता है कि यहां आज भी मां काली के होने का एहसास होता है। खास बात यह है कि श्री कालीमठ मंदिर में मां काली कोई मूर्ती नहीं है। मंदिर में श्रद्धालु एक कुंड की पूजा करते हैं।

पौराणिक मान्यता

मंदिर को लेकर मान्यता है कि दानवों का वध करने के बाद मां काली शांत नहीं हुईं, तो भगवान शिव उन्हें शांत करने के लिए उनके पैरों में लेट गए। जैसे ही मां काली ने भगवान शिवजी के सीने में पैर रखा, तो मां काली का क्रोध शांत हो गया। इसके बाद मां काली यहां स्थित कुंड में अंतर्ध्यान हो गईं। माना जाता है कि मां काली इस कुंड में समाई हुई हैं। तब से ही इस स्थान पर मां काली की पूजा की जाती है। बाद में आदि शंकराचार्य ने कालीमठ मंदिर की पुनर्स्थापना की थी। मंदिर के नजदीक ही कालीशीला भी है, जिसके बारे में कहा जाता है कि इसी शीला पर माता काली ने दानव रक्तबीज का वध किया था। मान्यता है कि इस शीला से हर साल दशहरे के दिन रक्त यानी खून निकलता है। इस स्थान पर आज भी मां काली के पैरों के निशान मौजूद हैं।

kalimath temple rudraprayag

Source – Rishikesh Day Tour

शारदे नवरात्रि की अष्टमी पर खुलता है कुंड

बता दें कि श्री कालीमठ मंदिर में स्थित दिव्य कुंड रजतपट श्री यन्त्र से ढका हुआ है। इसे पूरे साल में शारदे नवरात्रि में अष्टमी के दिन ही खोला जाता है। अष्टमी की मध्यरात्रि के दिन कुछ ही मुख्य पूजारी इस कुंड की पूजा करते हैं। कालीमठ में तीन अलग-अलग भव्य मंदिर है, जहां मां काली के साथ माता लक्ष्मी और मां सरस्वती की पूजा की जाती है। इन मंदिरों का निर्माण उसी विधान से संपन्न है, जैसा कि दुर्गासप्तशती के वैकृति रहस्य में बताया है अर्थात बीच में महालक्ष्मी, दक्षिण भाग में महाकाली और वाम भाग में महासरस्वती की पूजा होनी चाहिए। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि यहां सच्चे मन से मांगी गई हर मुराद पूरी होती है।

कैसे पहुंचें श्री कालीमठ मंदिर

यह ऐतिहासिक धार्मिक स्थल रुद्रप्रयाग जिले के गुप्तकाशी से लगभग 10 किलोमीटर दूर है। श्रद्धालु रुद्रप्रयाग से गौरीकुंड हाईवे के जरिए 42 किलोमीटर का सफर तय कर गुप्तकाशी पहुंच सकते हैं। गुप्तकाशी से श्री कालीमठ मंदिर पहुंचने के लिए वहां सुविधा उपलब्ध है। गुप्तकाशी नैशनल हाईवे के माध्यम से पड़ोसी शहरों और राज्यों से जुड़ा हुआ है। दिल्ली से आप बस द्वारा ऋषिकेश पहुंच सकते हैं। यहां से गुप्तकाशी के लिए बस और टैक्सी की सुविधा उपलब्ध है। यहां से नजदीकी हवाई अड्डा लगभग 197 किलोमीटर दूर देहरादून में है। अगर रेल मार्ग की मदद से गुप्तकाशी जाना चाहते हो तो आप रेल द्वारा गुप्तकाशी से 170 किलोमीटर दूर ऋषिकेश तक आ सकते हैं। इससे आगे का सफ़र सड़क मार्ग से ही तय करना पड़ेगा। दिल्ली से गुप्तकाशी 415 किलोमीटर और रुद्रप्रयाग से 43 किलोमीटर दूर है।

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