श्री कृष्ण जन्माष्टमी के दिन शुभ मुहुर्त में मणिमहेश कैलाश की पवित्र झील में होगा शाही स्नान

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श्री कृष्ण जन्माष्टमी के दिन हिमाचल प्रदेश (Himachal) के चंबा (chamba) जिले में भरमौर (bharmaur) में मणिमहेश कैलाश (manimahesh kailash) की पवित्र झील में छोटे शाही स्नान का आयोजन किया जाएगा। इस बार कोरोना संक्रमण के चलते कम संख्या में ही श्रद्धालुओं को डुबकी लगाने की अनुमति दी गई है। झील में सदियों से श्री कृष्ण जन्माष्टमी के मौके पर छोटे शाही स्नान की परंपरा रही है, जबकि राधाष्टमी के दिन बड़े शाही स्नान का आयोजन होता है।

इस बार कृष्ण जन्माष्टमी स्नान के लिए जम्मू के डोडा से चुनिंदा लोग ही आए हैं, जो झील में पूजा करने के बाद डुबकी लगाएंगे। सोमवार को ही यह दल मणिमहेश के लिए रवाना हो गया था। वहीं शुभ मुहुर्त की बात करें, तो मंगलवार सुबह 9:07 बजे से लेकर बुधवार सुबह 11:17 बजे तक शुभ मुहुर्त रहेगा। इसी मुहुर्त में छोटा शाही स्नान संपन्न होगा। जन्माष्टमी के दिन आयोजित किए जाने वाले छोटे शाही स्नान के दिन सदियों से श्रद्धालु विभिन्न राज्यों से आते रहे हैं। कोरोना के चलते सीमित संख्या में श्रद्धालुओं को इस बार यहां आने की अनुमति दी गई है। प्रशासन की ओर से अधिक संख्या में श्रद्धालुओं के शाही स्नान पर प्रतिबंध लगाया गया है।

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जम्मू कश्मीर के डोडा जिले से छड़ी लेकर गए श्रद्धालुओं में से लगभग 9 लोगों को ही झील में जाकर शाही स्नान की रस्में निभाने और स्नान की अनुमति मिली है। शाही स्नान को लेकर पंडितों की ओर से बताया गया है कि जन्माष्टमी के दिन स्नान के लिए शुभ मुहुर्त निकाल दिया गया है। इसी शुभ समय में पूजा अर्चना संपन्न होगी और सभी रस्में निभाई जाएंगी। भरमौर के चौरासी परिसर स्थित नरसिंह मंदिर में कृष्ण भगवान के बाल रूप के दर्शन भी लोग कर सकेंगे। इसमें मेला कमिटी की तरफ से पास ले जाने वाले लोगों को ही अनुमति होगी।

बताते चलें कि मणिमहेश कैलाश पर्वत के दर्शन डल झील से होते हैं। ऐसा कहा जाता है कि इस पर्वत पर सूरज की रोशनी पड़ने पर मणि के दर्शन होते हैं। इसे सिर्फ भाग्यशाली लोग ही देख पाते हैं। इस दिव्य दृश्य को देखने के लिए ठंड या बारिश का मौसम होने पर भी श्रद्धालु यहां से जाते हैं। वह काफी समय तक इस क्षण को देखने के लिए इंतजार करते हैं। यात्रा के दौरान ब्रह्माणी कुंड में स्नान अगर नहीं करने पर यात्रा अधूरी मानी जाती है। झील पर स्नान के लिए 13500 फीट तक चढ़ाई करनी पड़ती है।

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(Religious News from The Himalayan Diary)

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