15 अगस्त को आयोजित होगा बग्वाल मेला, लोग एक दूसरे पर बरसाते हैं पत्थर

by Ravinder Singh

जहां एक ओर पूरा देश रक्षाबंधन की तैयारियों में लगा है, वहीं दूसरी ओर अपनी नैसर्गिक सौंदर्य की छटा बिखेरने वाला उत्तराखंड एक बार फिर पाषाण युद्ध (बग्वाल मेला) की तैयारी में लगा है। चंपावत जिला मुख्यालय से लगभग 60 किलोमीटर दूर स्थित देवीधुरा में होने वाले मां बाराही देवी मंदिर में देवीधुरा मेले को लेकर तैयारी जोरों पर है। मेले को लेकर शुक्रवार को जिला पंचायत सभागार में जिला पंचायत अध्यक्ष की अध्यक्षता में एक बैठक का आयोजन किया गया। बैठक में मेले की तैयारियों पर चर्चा की गई। हर वर्ष देवीधुरा में आयोजित होने वाला यह मेला इस वर्ष 11 से 24 अगस्त तक चलेगा। मेले का मुख्य आकर्षण बग्वाल मेला (पाषाण युद्ध) रक्षाबंधन यानी 15 अगस्त (bagwal fair august 15 uttarakhand) को होगा।

सुविधाओं पर ध्यान

बैठक में मेले के शुरू होने से पहले सड़कें दुरुस्त करने, पैदल रास्तों की मरम्मत करने, अतिरिक्त बसों का संचालन करने, मेले में बिजली, पानी, संचार, यातायात, सुरक्षा, स्वच्छता को लेकर अधिकारियों को निर्देश दिए गए। बग्वाल मेला 5.50 किलोमीटर परिधि में होगा और पुलिस की ओर से मेला क्षेत्र में चार बैरियर लगाने के साथ मेला क्षेत्र को तीन सेक्टरों में विभाजित किया जाएगा। इस दौरान मेले में सुरक्षा व्यवस्था बनाए रखने के लिए पीएसी, पुलिस बल, महिला पुलिस बल को तैनात किया जाएगा। इस दौरान सुरक्षा के लिए एनएसएस, एनसीसी एवं स्काउट गाइड्स की सहायता भी ली जाएगी। इसके अलावा आबकारी विभाग को 15 अगस्त और 16 अगस्त को देशी-अंग्रेजी शराब की दुकानें बंद रखने और मेला क्षेत्र में अवैध शराब की बिक्री पर अंकुश लगाने के निर्देश भी दी गए हैं।

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बग्वाल मेले का इतिहास

बता दें कि देवीधुरा मेला के तहत होने वाले प्रसिद्द बग्वाल मेला को लेकर पर्यटकों में भी खासा उत्साह है। हर साल बग्वाल मेले के दिन भारी संख्या में श्रद्धालु और पर्यटक पहुंचते हैं। श्रावण मास की पूर्णिमा को होने वाले बग्वाल मेले में पाषाण युद्ध होता है। इस दौरान चार खेमों (दल) के लोग एक-दूसरे पर पत्थरों से प्रहार करते हैं। माना जाता है कि पत्थरों से चोट लगने के बाद बहा खून मां बाराही (पार्वती) को समर्पित हो जाता है। बग्वाल मेले को लेकर मान्यता है कि वर्षों पहले जब राक्षसों का आतंक बढ़ गया था, तो देवी के गणों ने उनसे मुक्ति के बदले प्रतिफल के रूप में लोगों से नर बलि की मांग की। जिसके बाद स्थानीय लमगड़िया, चम्याल, गहड़वाल और वाल्किया (खाम) कुलों के लोग क्रमशः अपने लोगों की बलि देते थे। एक बार बलि के लिए चम्याल कुल के एक ऐसे परिवार की बारी आई, जिसका केवल एक ही पुत्र था। परिवार की मुखिया (एक वृद्धा) ने उसे बचाने के लिए तपस्या शुरू कर दी। जिससे प्रसन्न होकर बाराही देवी ने कहा कि यदि चारों कुलों के लोग मंदिर प्रांगण में एकत्र होकर युद्ध कौशल दिखाएं और इस दौरान जब एक युवक के रक्त के बराबर खून बह जाए तो युद्ध बंद कर दिया जाए। तब से हर साल श्रावण मास की पूर्णिमा को अश्म वृष्टि की जाती है।

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